अरब सागर के आस-पास

Cover May Ank

 

पाखी के मई अंक में इस ख़ाकसार की कुछ कवितायेँ छपी हैं.

(पाखी से साभार )
अरब सागर के आस-पास 

बांस के करची और फट्टे पर सूखती है बाबा की सफेद धोती
उसके कोने उड़ते रहते हैं फर्र फर्र
मेरा सात साल का चकित मन भी उड़ता है साथ साथ

-ये हवा कहां से आती है
-पछुआ है… पच्छिम से
-कहां से?
-अरब सागर से…
-कौन फूंकता है?
-तुम्हारे बाबा के बाबा के बाबा
-मैं सब भूल रटने लगता
-बाबा के बाबा के बाबा…
खुद को लुटा देता हूं मैं उस संगीतात्मकता पर
फूंकते है बाबा के बाबा के बाबा के बाबा…
उसी संगीत को खोजता मैं अरब सागर के पास आ गया हूं… मुंबई

वर्सोवा तट पर पत्थर हैं बड़े-बड़े
जिन पर बैठ प्रेमी जोड़े सपने देखते हैं
और छोटे-छोटे बहुत से पत्थर
बाहर सड़कों पर भी हैं और लोगों के हाथों में और सीनों में भी
और जब तक कि वक्त बदल न जाए
एक हिंदू लड़की बुर्का डाल मिलती रहेगी अपने उत्तर भारतीय प्रेमी से
ये पत्थर ही समझते हैं उनके प्रेम को

रोज शाम समुद्र के पास होते हैं कितने ही प्रेमी
शराबी, गंजेड़ी, विचारक, कवि और अभिनेता
और सबका अपना-अपना डूबता हुआ सूरज
सूरज की रोज-रोज की खुदकुशी से
और लो मैं फिर आ गया तुम्हारे लिए वाहवाही से
दूर अब मैं बेवक्त चला जाता हूं वहां किसी दिन… दिन में…

इस उत्तर आधुनिक तटीय शहर और प्रागैतिहासिक समुद्र के बीच
बँटता हूं मैं बार-बार वर्सोवा के तट पर

वहां बैठ लगता है एक छोटे से जहाज या नाव से
बहुत पहले के खोए हुए मेरे चरवाहे पुरखे
गाय, भैंस, बकरियों के साथ वापस लौट आएंगे किसी दिन
अपने साथ फारस और मिस्र से संकर नस्ल के कई पौधे और बीज लेकर
और गले लगाकर मुझे कहेंगे ‘हां मैं भी फूंकता हूं …मैं तेरे बाबा का बाबा…’
और उजागर करेंगे कई नए विचार, मनगढंत बातें और परिकल्पनाएं
कि लाजवंती को शर्माते देख उन्हें मजा नहीं आता…
जैसे जिंदा मछलियों के शरीर में कांटे नहीं होते
वे तो आत्मरक्षा के लिए
कांटे उगाती हैं शरीर के भीतर
कि आनर्तपुर*  का राजा विकास चाहे जो करे, सही आदमी नहीं है..

और उन्हें ताज्जुब हो कि उनके पुरखों के नाम नहीं हैं किसी भी इतिहास में
जिन्होंने आजादी की कई लड़ाइयां लड़ी थीं
खुद से
अपने मध्यकालीन मन से
जिन्होंने तलवार, भाले, बरछे को
घर के सबसे उदास कोने में धकेल दिया था
खून नहीं बहाया था बेवजह
जिन्होंने पानी बचाया, पेड़ लगाए, फसलें उगाईं
चार ब्याह और बारह बच्चों के युग में जिन्होंने एक ही लड़की से प्रेम किया ताउम्र
जो तारे देख बारिश बताते थे
मिर्च, नई शराब के नुस्खे
और हारमोनियम लाए यहां पर किसी दूर देश से…
उनका कहीं नाम नहीं है इतिहास में!!
वे मुझसे पूछते हैं उनके बारे में
मैं उनमें से किसी को नहीं जानता…

मैं अब यह जानता हूं कि बहुत से पुरखे जब फूंकते हैं एक साथ
तो अरब सागर से हवा आती है
हजारों मील दूर किसी गांव में
ताकि सूखती धोती की पृष्ठभूमि पर
बाबा और पोते के बीच बात हो अपने भूले हुए पुरखों पर…

एक ‘विकसित प्रदेश’ के मुख्यमंत्री का जन्म स्थान। ‘महाभारत’ के समय के पूर्व समग्र पश्चिम भारत में आनर्त राज्य बहुत शक्तिशाली और समृद्ध था। उसका सीमा विस्तार आज के समग्र गुजरात और राजस्थान, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में फैला था। कहा जाता है कि आनर्त योद्धाओं ने कुरुक्षेत्र के युद्ध में पांडवों एवं कौरवों की ओर से हिस्सा लिया था और युद्ध समाप्ति के बाद भी लड़ते रहे थे।

चित्राकृति : चित्तप्रसाद 

 

तू ज़िंदा है..

 

डिस्क्लेमर
यहाँ कोई भी पात्र काल्पनिक नहीं है और मैं ‘दीक्षित’ मार्क्सवादी नहीं हूँ. ये बेतरतीब बातें है, सो किसी साहित्यिक विधा के खांचे में फिट न बैठे ..

फ़्लैशबैक में पहला परिचय
चाचा जे एन यू में थे उन दिनों, और हम बहुत छोटे थे .. एक दम बुतरू .. एक दिवाली वो घर लौटे तो दो नयी चीज़ें लेकर आये. हंसिया-हथौड़ा कंदील और एक दाढ़ी वाले बाबा की तस्वीर।
हम पूछे : ई के छिये हो ? (ये कौन हैं)
चाचा बोले “कार्ल मार्क्स”.
ये हमारी पहली मुलकात थी और मुझे वो तस्वीर भा गयी .

मोंताज में स्कूल-कॉलेज वाले दिन वाया दूरदर्शन और हिंदी अख़बार

यूरोपीय देशों और सोवियत संघ में जो हुआ उसके बाद उनके दिन “लद जाने” की ख़बर हर तरफ है …
वाद-विवाद का विषय है : ‘मौजूदा वक़्त में मार्क्सवाद की निरर्थकता’
एक सोच की मौत की अफवाह है ..हर तरफ
एक प्रायोजित जश्न है
और भविष्यवाणियों से बाज़ार उछाल पर है

एक्सट्रीम क्लोज-अप में वाइस-ओवर
वो सही में बीत गया क्या?
हमारी सोच को हर दिन इम्तिहान देना होगा न.. ?

तू ज़िंदा है..
पिछले कई सालों से गोदावरी हॉस्टल बहन का स्थायी पता था . अब वो से शिफ्ट कर गयी है .. मैं उसके के घर गया तो वहां मुझे दरवाज़े के पास एक बड़ी सी तस्वीर मिली ..

Shepha ka ghar

Shepha ka ghar

ये तस्वीर उस तस्वीर से मेल खाती है जो चाचा कभी लेकर आये थे. बस आकार में उस थोड़ी बड़ी है और ब्लैक एंड व्हाइट की जगह रंगीन है ..

और मैं शैलेन्द्र का लिखा हुआ ये क्रन्तिकारी गीत गुनगुना रहा हूँ ..

हज़ार भेष धर के आई मौत तेरे द्वार पर
मगर तुझे न छल सकी चली गयी वो हारकर
नयी सुबह के संग सदा तुझे मिली नयी उमर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर
तू ज़िंदा है तू जिंदगी की जीत पर यकीन कर
अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर

आज उस दाढ़ी वाले बाबा की जयंती है ..

लाल सलाम!

 

O des se aane wale bata..

“वो शहर जो हमसे छूटा है, वो शहर हमारा कैसा है?

सब लोग हमें प्यारे हैं मगर, वो जान से प्यारा कैसा है ?”

..
और हम फिर एहसानमंद हुए पवन जी के.. क्या सुना दिया साहब, मन भर ही नहीं रहा ..

कई दिनों से इन लफ़्ज़ों की रौशनी में सेपिया टोन की हज़ार तस्वीरें खिंच रही है मन में .. मेमनसिंह से नार्थ वेस्ट फ्रंटियर, दिल्ली की रिफ्यूजी कॉलोनी से लाहौर तक..कांग्रेसी, लीगी और संघी नारों के बीच आखिरी सलाम कहते लोग..
एक ख़ास बात ..आपको सुनते हुए लगेगा नहीं कि इस गाने में दो शायरों की शिरकत है..उर्दू के दो बड़े नामवर शायर अख्तर शिरानी और अहमद फ़राज़ के लफ्ज़ एक ही नज़्म के हिस्से लगते हैं यहाँ आकर.. यहाँ बचपन है, जवानी है, पुराने खुशगवार दिन हैं, शिकायतें है, जलावतनी* का दर्द है और एक दिन वतन लौटने की उम्मीद भी है. यहाँ नास्टैल्जिया है, पर मौजूदा हालत एक पालिटिकल कमेंट्री भी है .. दिल को चाक करने वाली धुन और आबिदा की मरहम करने वाली आवाज़ में ये सुनिए ..

ओ देस से आने वाले बता

 

*अहमद फ़राज़ को जनरल जिया उल हक़ के फौजी शासन ने इन्किलाबी गीत लिखने के कारण गिरफ़्तार किया था, बाद में उन्हें पाकिस्तान से बहुत बरस बाहर रहना पड़ा था.
**… और कोई तर्क नहीं है, फिर भी अपना छोटा शहर मधेपुरा भी दिख रहा है बार बार ..

 

 

कुछ स्क्रिब्लिंग्स..

बच्चों की एक किताब पर काम कर रहा था। ये हाशिये पर से बरामद हुए कुछ  स्क्रिब्लिंग्स ..

की-बोर्ड पर अजनबी उँगलियाँ 
माँ कहाँ  हो तुम ?
कंप्यूटर से देखो फिर 
“पी” और “ज़ेड” है गुम 
 
दो बहनें
ये भारी  बस्ता
ले लो न आपा मेरी 
हालत है खस्ता 
 
काश .. 
उड़ती पतंग 
कल के  पेपर ले आ ना 
तू अपने संग 
 
टिफिन के बाद 
चल, जग, बज- टन-टन
ओ घंटी,ओ सोती घंटी
अब लागे न मन 

Jaate Huye Vasant ke bare men..

एक लम्बी कविता “जाते हुए वसंत के बारे में” का एक अंश
……….
क्या जाते हुए वसंत ने
तुम्हारे उस दुपट्टे से
इजाज़त मांगी थी,
जिसके साथ
पिछले कई महीने
दिल्लगी की थी उसने
और झीने पर्दों से
जिनसे पूछकर
बा-अदब
आता था वो
चाँद रातों में
अक्सर हमारे कमरे..
नहीं ना ?
…..

दुआएँ ..

महीने भर बाद यहाँ आना हो रहा है ..

फेसबुक और ट्विटर से दूर ..अच्छा लगा..खूब लिखा, खूब गाने सुने और थोडा बहुत घूमा भी .. घुमक्कड़ी की बातें जल्द ही साझा करूँगा..

वैसे तो हर जनवरी में लगता है की ये बढियां साल रहेगा पर इस दफा कुछ ज्यादा ही यकीन है ..गर सब ठीक रहा तो कुछ अच्छी ख़बरें आएँगी .. देखते हैं ..:)

आपको भी  नए साल की शुभकामनायें ..

अच्छी फ़सल, बेहतर सरकार, खूबसूरत मौसम, चाँद रातों  और अमन के लियें दुआएँ .. 

राग हमीर में ये तराना सुनिए उस्ताद राशिद खां साहब की आवाज़ में

 

 

 

 

 

main hoon..

वसंत और पतझड़ में मैं फरक नहीं कर पाता .. दोनों मौसम मुझे एक से लगते हैं..सर्दियों की देहरी पर ,मन में कुछ एक सा ही उठता है .. टूटता है .. लगातार  कई चीज़ें चल रही हैं  भीतर .. सोचा लिख लेता हूँ क्या पता पहले की तरह जाया न हो जाये .. मुझ तक ही न रह जाये .. बहुत कोशिश पर भी “राइटर वाली डिसिप्लिन” नहीं आ पाई मुझमें .. और उस पर चार चाँद ..मैं आराम पसंद तो हूँ ही बेतरतीब भी हूँ .. .. इस लिए अभी कुछ दिनों के लिए कहीं और जा रहा हूँ (यहाँ से भी और ट्विटर से भी ).. कम-स-कम कोशिश कर रहा हूँ .. कुछ नए अनुभव , नयी कहानियाँ, नए गीतों के साथ जल्द ही लौटूंगा .. .जिन लोगों से रोज़ का राब्ता था, उनके बीच से बिन बताये गायब हो जाना मुझे ठीक नहीं लगा.. गर कुछ लिखा, तो पर आपसे साझा करता रहूँगा ..  rajshekhar.in पर .. आने वाले साल की शुभकामनायें ..

Miraza Galib ko gaati M S Subbulakshmi

एम एस सुब्बुलक्ष्मी जब सुप्रभातम गाती हैं तो लगता है मानो पूरा घर धूप, दीप, कर्पूर से महक उठा हो..कहीं  दूर दराज़ के किसी दक्षिण भारतीय मंदिर के एकांत में बैठा पाता हूँ खुद को.. ऐसा स्वर, इतनी श्रद्धा, इतना समर्पण.!!!.लगने लगता है क्या पता शायद सच में ईश्वर हो कहीं..हर छंद के साथ मैं अनास्था से आस्था की तरफ बढ़ता हूँ..नुसरत फ़तेह अली खान और आपने गाँव में भगैत गाने वालों को सुनकर भी ऐसा ही लगता है कुछ..मैं खुद को कहीं छोड़ आता हूँ..इनके हाथों.
आज से पहले एम एस सुब्बुलक्ष्मी जी का सुप्रभातम, विष्णु सहस्र्नामम, हनुमान चालीसा, और भज गोविन्दम ही सुना था.. आज सुबह वो ग़ालिब के मार्फ़त अल्लाह का नाम ले रही थीं…वज़नी उर्दू है , स्वर में थोडा तमिळ का भी पुट है पर यहाँ भी शिद्दत वही है.. “अब ज़फ़ा से भी हैं महरूम हम अल्लाह अल्लाह/इस कदर दुश्मन-ए-अरबाब-ए-वफ़ा हो जाना.. इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना” फ़ना होना क़तरे की क़िस्मत नहीं इशरत है. इस खोने में ख़ुशी है..एक उल्लास है..
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