मई दिवस
मेरे कुछ साथी हैं
साथी क्या हैं..भाई हैं
हम साथ ही थे स्लेट और चॉक के मौसम तक
फिर मेरे हाथों में किताब आई उनके हाथों में हंसिया..
….
मैं शहर में नफ़ा नुकसान के शब्द उगाने लगा दिहाड़ी पर,
और वो खेत-दर-खेत
लिखते रहे गीत
हर मौसम
रबी, खरीफ और गरमा के छंदों में
धान-गेंहू-मक्के का लोकगीत
महाकाव्यात्मक …
बीज रोपते, फ़सल काटते
भुट्टा उगाते, दाना छुड़ाते
उन बरकत भरे हाथों को छूने के लिए भी
मुझ शहरी को अब दूर जाना होता है..
भाई, मेरे शब्द तुम्हारे हाथ चूमना चाहते हैं…






